भारत का संविधान किससे लिखा गया?

आप सभी जानते हैं और हमें पढ़ाया भी यही जाता है कि भारतीय संविधान का निर्माता कौन है—डॉ. भीमराव आंबेडकर। उन्हें समूचे देश में इसी नाते जाना जाता है और उनका योगदान अमर है। लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि जिस संविधान की आज पूरा देश पूजा करता है, उसे आखिर किस पेन, किस पेंसिल या किस विशेष लेखनी से लिखा गया? इसे किसके द्वारा हस्तलिखित किया गया? हाँ, हम यहाँ बात कर रहे हैं उस व्यक्ति के बारे में जिसने अपने हाथों से इस विशाल दस्तावेज को स्याही चढ़ाया। डॉ. आंबेडकर संविधान के निर्माता हैं, पर हम बात कर रहे हैं उस कलाकार की जिसने अपनी कलम से इतिहास रचा।
परिचय: एक ऐतिहासिक प्रश्न और जिज्ञासा
भारत का संविधान न केवल एक कानूनी दस्तावेज है, बल्कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सपनों का साकार रूप है। जब भी हम संविधान की बात करते हैं, तो सबसे पहले हमारे मन में डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम आता है, जो संविधान निर्माण समिति के अध्यक्ष थे। लेकिन, इस विशाल और पवित्र ग्रंथ के पीछे कई ऐसी कहानियां हैं, जो अक्सर इतिहास के पन्नों में खो जाती हैं। एक ऐसा ही रोचक और महत्वपूर्ण सवाल है—“भारत का संविधान किससे लिखा गया?”
आमतौर पर लोग यह जानते हैं कि संविधान किसने बनाया, लेकिन यह बहुत कम लोगों को पता है कि उस काले स्याही और सुंदर अक्षरों को किस माध्यम से कागज पर उकेरा गया। क्या यह कोई साधारण पेन था? क्या यह कोई जादू की कलम थी? या फिर कोई ऐसा उपकरण था जो समय की रफ्तार को झेलते हुए भी आज तक उसकी चमक बनाए हुए है? आइए, इस लेख के माध्यम से यात्रा करें उस दौर की, जब एक कलम ने एक राष्ट्र के भविष्य को लिखा। यह कहानी है तकनीक, कला और अद्भुत मानवीय परिश्रम के अनूठे संगम की।
हस्तलिखित संविधान का ऐतिहासिक निर्णय
1947 में आजादी के बाद, जब संविधान निर्माण का काम अपने चरम पर था, तो संविधान सभा के सामने एक बड़ा सवाल था कि अंतिम दस्तावेज को कैसे प्रस्तुत किया जाए। उस समय दुनिया में प्रिंटिंग तकनीक काफी उन्नत थी और अधिकांश देश अपने संविधानों को छपवाकर लाते थे। भारत के लिए भी यह एक आसान रास्ता हो सकता था। मशीनों से हजारों प्रतियां छापी जा सकती थीं, जो एक समान और त्रुटिरहित होतीं।
लेकिन, संविधान सभा ने एक अलग और कठिन रास्ता चुना। उन्होंने निर्णय लिया कि भारत का संविधान, जो एक ऐसे देश की आत्मा है जहाँ हजारों वर्षों की लिखित परंपरा रही है, उसे मशीन की रूखी छाप के बजाय मानव हाथों से लिखवाया जाएगा। यह निर्णय केवल औपचारिकता नहीं था; इसके पीछे एक गहरा प्रतीकात्मक भाव था। माना गया कि मशीनें भावनाओं से रहित होती हैं, जबकि एक हस्तलिखित दस्तावेज में लेखक की श्रद्धा, उसकी मेहनत और राष्ट्र के प्रति समर्पण झलकता है। यह निर्णय संविधान को एक शाश्वत और पवित्र ग्रंथ का दर्जा देने के लिए लिया गया था, जिसे देखकर आने वाली पीढ़ियाँ उस भावना को महसूस कर सकें जिससे यह बना था। इस प्रकार, एक ऐसे व्यक्ति की तलाश शुरू हुई, जो इस विशाल और जिम्मेदारी भरे कार्य को अंजाम दे सके।
प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा: वह व्यक्ति जिसने इतिहास लिखा
हस्तलिखित संविधान के निर्णय के बाद, सबसे बड़ी चुनौती था एक ऐसे कॉलीग्राफर (सुलेखक) को ढूँढना जो न केवल सुंदर लिखता हो, बल्कि इतने बड़े और महत्वपूर्ण काम को समय सीमा के भीतर पूरा करने की क्षमता रखता हो। तब भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के सामने एक नाम आया—प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा।
रायज़ादा जी बिहार के मधुबनी जिले के देसौंठ गाँव के मूल निवासी थे। वे अपनी सुंदर लिखावट के लिए मशहूर थे और उन्होंने कानून की पढ़ाई की थी। उनके दादा, राय बहादुर हरी नारायण रायज़ादा, एक प्रसिद्ध कॉलीग्राफर थे और प्रेम बिहारी ने अपने दादा से ही सुलेख की कला सीखी थी। जब उन्हें यह प्रस्ताव दिया गया, तो उन्होंने इसे एक साधारण अनुबंध की तरह नहीं, बल्कि एक पवित्र अवसर के रूप में लिया।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि जब उनसे पारिश्रमिक के बारे में पूछा गया, तो रायज़ादा जी ने इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “मैं अपने देश के संविधान को लिखने के लिए कोई पैसा नहीं लूँगा। यह मेरे लिए राष्ट्रसेवा का अवसर है, मेरे लिए गर्व की बात है।” उन्होंने बस इतना ही शर्त रखी कि उन्हें जो कागज, स्याही और कलम चाहिए, वह सरकार उपलब्ध कराएगी, साथ ही उन्हें एक शांत और सुरक्षित स्थान पर रखा जाए ताकि वे निर्विघ्न काम कर सकें। सरकार ने उन्हें दिल्ली में ‘कॉन्स्टिट्यूशन हाउस’ (जो अब विज्ञान भवन है) में एक कमरा दिया, जहाँ वे अपने इस महान कार्य में लग गए।
प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा: एक संक्षिप्त जीवनी
प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा का जन्म बिहार के मधुबनी जिले के देसौंठ गाँव में हुआ था। वे एक प्रतिभाशाली सुलेखक (Calligrapher) और कानून के जानकार थे। उन्होंने सुलेख की अद्भुत कला अपने दादा राय बहादुर हरि नारायण रायज़ादा से सीखी, जो स्वयं इस क्षेत्र के विशेषज्ञ थे।
भारत के संविधान की मूल प्रति को हस्तलिखित करने का गौरवपूर्ण दायित्व उन्हें सौंपा गया था। इतिहास में अमर होने वाली यह उपलब्धि उन्होंने अपनी सुंदर लिखावट और धैर्य से हासिल की। सबसे बड़ी बात यह थी कि इस विशाल कार्य के लिए उन्होंने सरकार से कोई भी मौद्रिक मेहनताना स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि देश के संविधान को लिखना कोई नौकरी नहीं, बल्कि एक पवित्र राष्ट्रसेवा है। छह महीने के अथक परिश्रम के बाद जब उन्होंने यह कार्य पूर्ण किया, तो उनका नाम भारतीय इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अंकित हो गया। आज भी संसद भवन में सुरक्षित यह दस्तावेज़ उनकी कला और समर्पण का प्रमाण है।
‘303 नंबर की निब’: वह कलम जिसने ताकत दी
अब आते हैं हमारे मुख्य प्रश्न पर—संविधान किससे लिखा गया? रायज़ादा जी ने यह काम किसी आम फाउंटेन पेन या बॉलपेन से नहीं किया। उन्होंने नंबर 303 डिप-पेन निब्स का उपयोग किया। ये निब्स विशेष रूप से इंग्लैंड के प्रसिद्ध शहर बर्मिंघम से आयात किए गए थे।
उस समय भारत में ऐसी निब्स उपलब्ध नहीं थीं जो इतनी बारीक, टिकाऊ और स्याही के प्रवाह को नियंत्रित करने में सक्षम हों। 303 नंबर की निब एक ऐसी विशेष तकनीक से बनी थी जो स्याही को बहुत ही संयमित मात्रा में छोड़ती थी। इसकी नोक बहुत बारीक और लचीली थी, जिससे लिखावट में एक सुंदर ‘इटैलिक’ स्टाइल आता था। संविधान को लिखने के लिए आवश्यक था कि अक्षर एक समान हों, स्पष्ट हों और साथ ही उनमें एक कलात्मक खूबसूरती भी हो। ये निब्स स्टील की थीं और इनकी विशेषता यह थी कि ये कठोर कागज पर भी लंबे समय तक अपनी बारीकी बनाए रखती थीं। साधारण पेन की निब कठोर कागज पर लिखते समय जल्दी फैल जाती है या मुड़ जाती है, जिससे लिखावट पर असर पड़ता है। लेकिन 303 निब ने सुनिश्चित किया कि संविधान का हर शब्द, हर अक्षर पूर्ण स्पष्टता और सुंदरता के साथ कागज पर उकेरा जाए। यह कलम केवल लेखन का साधन नहीं थी, बल्कि वह सेतु थी जो विचारों को शब्दों में बदल रही थी।
छह महीने का अथक परिश्रम: एक तपस्या
रायज़ादा जी ने अगस्त 1949 से शुरू करके जनवरी 1950 तक लगभग छह महीने तक निरंतर कार्य किया। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होना था, इसलिए समय की सीमा बहुत कठिन थी। वे प्रतिदिन 8 से 10 घंटे तक लगातार लिखते थे। उन्हें हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में संविधान लिखना था। अंग्रेजी में इटैलिक स्टाइल और हिंदी (देवनागरी लिपि) में एक विशेष सुंदर शैली का प्रयोग किया गया।
इस काम की कठिनाई का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि संविधान की मूल प्रति का हर पृष्ठ लगभग 22 इंच लंबा और 16 इंच चौड़ा था। यह कागज पूना (अब पुणे) की ‘ओल्ड हॉल’ मिल से विशेष रूप से मंगवाया गया था। यह कागज बहुत मोटा और टिकाऊ था ताकि यह सदियों तक बना रहे। इतने बड़े आकार के कागज पर इतनी बारीक और सटीक लिखावट एक चुनौती थी। कोई भी छोटी सी गलती पूरे पृष्ठ को बर्बाद कर सकती थी, क्योंकि इसे काट-छांट कर ठीक करना संभव नहीं था। रायज़ादा जी ने बताया था कि कई बार ऐसा हुआ कि पृष्ठ के आखिरी शब्दों के पास कोई छोटी सी गलती हो जाती थी, और उन्हें पूरा पृष्ठ फेंककर नया लिखना पड़ता था। इस तरह का मानसिक दबाव किसी भी साधारण लेखक के लिए झेलना मुश्किल था, लेकिन रायज़ादा जी के अभ्यास और धैर्य ने इस असंभव कार्य को संभव बनाया। उन्होंने कुल 251 पृष्ठों को हस्तलिखित किया (हिंदी और अंग्रेजी मिलाकर), जिसमें हर पंक्ति और हर शब्द किसी मोती की तरह चमकता है।
254 निब्स और 254 बोतल स्याही: रोचक तथ्य
संविधान के लेखन के दौरान इस्तेमाल की गई सामग्री के आंकड़े हमें इस कार्य के विशाल आकार का पता देते हैं। यह एक आम धारणा है कि एक पेन से पूरी किताब लिखी जा सकती है, लेकिन संविधान जैसे दस्तावेज के मामले में यह सच नहीं था।
रायज़ादा जी ने इस कार्य के लिए कुल 254 निब्स का उपयोग किया। क्योंकि वे डिप-पेन का उपयोग कर रहे थे, जिसमें निब को बार-बार स्याही में डुबोना पड़ता है और कठोर कागज पर रगड़ से निब की बारीक नोक घिस जाती थी या उसकी लचीलापन कम हो जाता था। जैसे ही निब की गुणवत्ता थोड़ी भी कम होती थी, वे उसे बदल देते थे ताकि लिखावट की गुणवत्ता में कोई फर्क न आए।
इसी प्रकार, स्याही का भी एक विशेष इंतजाम था। इसमें आम स्याही का उपयोग नहीं किया गया था। इसके लिए 254 बोतलें स्याही खरीदी गई थीं। यह स्याही विशेष रूप से ‘पार्कर’ कंपनी की थी या फिर विशेष रूप से तैयार की गई थी जो चमकदार थी और समय के साथ फीकी नहीं पड़ती थी। इस स्याही में सोने और चांदी के कणों का मिश्रण भी बताया जाता है, जिससे लिखा हुआ पाठ एक अनूठी चमक रखता था और सदियों तक अमिट रहे। यह आंकड़ा (254) एक अहम तथ्य है, जो बताता है कि इस कार्य में कितनी सावधानी और सामग्री की आवश्यकता थी। अगर औसतन देखें, तो लगभग हर दिन एक से अधिक निब और एक बोतल स्याही का उपभोग हुआ। यह आंकड़ा उस विशाल आकार और गहराई को दर्शाता है जो इस दस्तावेज में समाई हुई है।
नंदलाल बोस की कला और कलम का जादू
संविधान केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, यह एक कलाकृति भी है। इसके पृष्ठों की सज्जा और चित्रण प्रसिद्ध चित्रकार नंदलाल बोस और उनकी टीम ने किया था। शांतिनिकेतन के इस महान कलाकार ने संविधान के हर पृष्ठ को एक विशेष ऐतिहासिक पहचान दी। पृष्ठों के किनारों पर सिंधु घाटी सभ्यता के चित्रों से लेकर मुगल काल, रामायण, महाभारत, गौतम बुद्ध, महावीर, अशोक, शिवाजी, गुरु गोबिंद सिंह और रानी लक्ष्मी बाई जैसे प्रतीकों को दर्शाया गया है।
रायज़ादा जी के लिखने का काम इन्हीं चित्रों के बीच में होता था। उन्हें यह सुनिश्चित करना था कि उनकी लिखावट न तो चित्रों पर आए और न ही वे इतनी संकरी हो कि पढ़ने में तकलीफ हो। कलम की निब की बारीकी ने यहाँ चमत्कार किया। नंदलाल बोस की रंगीन कला और रायज़ादा जी की काली स्याही का यह संगम संविधान को एक अद्भुत रूप देता है। प्रस्तावना (Preamble) के पृष्ठ पर तो विशेष रूप से कला और लिपि का संगम देखने योग्य है, जहाँ देवनागरी और रोमन लिपि में लिखे गए शब्दों के चारों ओर सुनहरी और रंग-बिरंगी सजावट है। कलम ने न केवल कानून को लिखा, बल्कि कला के साथ तालमेल बिठाकर इतिहास को अमर बना दिया।
मूल संविधान की सुरक्षा: हीलियम भरा बॉक्स
जिस तरह संविधान लिखा गया, उसी तरह उसे सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी अद्भुत है। हस्तलिखित संविधान की मूल प्रति आज संसद भवन के पुस्तकालय में एक विशेष कक्ष में रखी गई है। यह प्रति नाइट्रोजन या हीलियम गैस से भरे एक विशेष एयर-कंडीशनड बॉक्स में सुरक्षित है। इस व्यवस्था का उद्देश्य संविधान को ऑक्सीकरण (oxidation), नमी, धूल और कीड़े-मकोड़ों से बचाना है।
यह दस्तावेज लगभग 3.75 किलोग्राम वजनी है। समय-समय पर विशेषज्ञ इसकी स्थिति की जाँच करते हैं। जिस कलम ने इसे लिखा था और जिस स्याही का उपयोग किया गया था, उसकी गुणवत्ता इतनी उत्तम थी कि आज सत्तर वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी स्याही का कोई अक्षर फीका नहीं पड़ा है और कागज में कोई पीलापन नहीं आया है। यह उस सामग्री की गवाही है जिसे 303 निब्स और विशेष स्याही के रूप में चुना गया था। यह केवल एक दस्तावेज नहीं है, यह भारत की संप्रभुता का प्रतीक है, जिसे भविष्य की पीढ़ियों के लिए यथावत रखना राष्ट्र की नैतिक जिम्मेदारी है।
निष्कर्ष: कलम की ताकत और राष्ट्र की पहचान
अंत में, जब हम सवाल करते हैं कि “भारत का संविधान किससे लिखा गया?” तो उत्तर सिर्फ एक वस्तु—’303 निब’—तक सीमित नहीं है। यह उत्तर उस युग की मानसिकता, शिल्प कौशल और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक है। यह कहानी हमें बताती है कि महान कार्यों के पीछे न केवल बड़े विचारक होते हैं, बल्कि वे कारीगर भी होते हैं जो अपनी मेहनत और कला से उन विचारों को मूर्त रूप देते हैं। प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा का नाम इतिहास के पन्नों में अक्सर वह सम्मान नहीं मिलता जो उन्हें मिलना चाहिए, लेकिन उनके द्वारा लिखा गया हर अक्षर आज भी भारतीय लोकतंत्र का आधार है।
डॉ. आंबेडकर ने संविधान का ढांचा खड़ा किया, संविधान सभा ने उसे अपनाया, लेकिन उस ढांचे को अमरत्व देने का काम रायज़ादा की कलम ने किया। 254 निब्स और सैकड़ों बोतल स्याही का यह उपयोग याद दिलाता है कि स्वतंत्रता का दस्तावेज तैयार करना एक आसान काम नहीं था। यह एक ऐसी तपस्या थी जिसमें मानव हाथों ने मशीनों को भी पीछे छोड़ दिया। आज डिजिटल युग में, जहाँ हम कुछ सेकंड में लाखों शब्द टाइप कर देते हैं, रायज़ादा जी का वह हस्तलिखित दस्तावेज हमें धीरज, सूक्ष्मता और समर्पण का पाठ पढ़ाता है।
यह जानकारी बहुत कम लोगों को है। हम अक्सर बड़े-बड़े नामों को जानते हैं, लेकिन उन अनगिनत कारीगरों और उनके उपकरणों को भूल जाते हैं जो इतिहास की नींव रखते हैं। अगर आपने आज पहली बार यह जाना कि भारत के संविधान की मूल प्रति किस प्रकार की कलम और निब से लिखी गई थी, तो यह जानकारी सिर्फ अपने तक सीमित न रखें। इसे अपने मित्रों, परिवार और बच्चों के साथ साझा करें।
उन्हें बताएं कि 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ हमारा संविधान एक ऐसे व्यक्ति ने लिखा था जिसने इसके लिए कोई पैसा नहीं लिया, और उसने ऐसी कलम का इस्तेमाल किया जो दुनिया के एक कोने से मंगाई गई थी। यह केवल एक रोचक तथ्य नहीं है, बल्कि यह हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि हमारा संविधान न केवल कानूनों का समूह है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत की पहली कलात्मक और भावनात्मक विरासत है। आइए, इस विरासत को सम्मान दें और इसकी कहानी को आगे बढ़ाएं।